इनामदार

जासूसी से अय्याशी तक, केजरीवाल का कच्चा-चिट्ठा!
10/10/2016
दिल्ली में अरविंद केजरीवाल सरकार के कामकाज को लेकर उठ रहे सवालों के बीच ‘ओपन’ मैगजीन ने बड़ा खुलासा किया है। मैगजीन के ताजा अंक में छपी रिपोर्ट में केजरीवाल सरकार के बारे में ऐसी जानकारियां दी गई हैं, जो अपने आप में चिंता की बात है। कुल मिलाकर निचोड़ यह है कि आम आदमी के नाम पर सत्ता में आई यह मंडली इन दिनों अय्याशी में डूबी हुई है। मनमानी ऐसी है कि यह मुख्यमंत्री से लेकर मामूली विधायक तक किसी संविधान में तय नियम-कायदों को मानने को तैयार नहीं है। सरकार में केजरीवाल के रिश्तेदारों से लेकर पार्टी के वॉलेंटियर्स तक को खुलेआम रेवड़ियां बांटी जा रही हैं। ओपन मैगजीन में छपी रिपोर्ट की अहम बातों को हम यहां हिंदी में आपके लिए लेकर आए हैं।
1. केजरीवाल का बर्ताव सनकी जैसा
अरविंद केजरीवाल के साथ काम करने वाले बताते हैं कि वो बेहद तुनकमिजाज और घमंडी हैं। अपनी बात मनवाने के लिए वो ड्रामेबाजी में भी माहिर हैं। उनकी ये आदतें कई बार निजी और सार्वजनिक बातचीत में जाहिर हो चुकी है। 2014 में लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद जब प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव ने उनका विरोध शुरू किया तो बैठकों में वो फिल्मी स्टाइल में रोने और कभी-कभी चीखने-चिल्लाने लगते थे। आशुतोष ने अपनी किताब में भी लिखा है कि उस दौर में केजरीवाल अनियंत्रित रूप से भावुक हो गए थे। कई बार वो रोने लगते थे और एक बार तो जमीन पर लोट गए।
2. जासूसी एजेंसी बनाने की कोशिश
2015 में दूसरी बार सत्ता में आने के बाद अरविंद केजरीवाल ने ईडी, पुलिस, सीबीआई और कुछ दूसरी खुफिया एजेंसियों में काम कर चुके रिटायर्ड और मौजूदा अधिकारियों की टीम बनानी शुरू कर दी। इन लोगों को सीक्रेट तरीके से फंडिंग की गई। केजरीवाल का इरादा था कि वो इन लोगों की मदद से दिल्ली सरकार की एक खुफिया/जासूसी एजेंसी बनाएंगे जो मौजूदा एंटी-करप्शन ब्यूरो (एसीबी) के अलावा काम करेगी। ये सारा काम चोरी-छिपे चल रहा था और इसके लिए कानूनी तौर पर जरूरी मंजूरी भी नहीं ली गई। सारा ढांचा इस तरह का था कि ये सीक्रेट एजेंसी सिर्फ और सिर्फ अरविंद केजरीवाल को रिपोर्ट करेगी।
3. जासूसी के साजो-सामान और भर्तियां भी!
सत्ता संभालने के कुछ दिनों के अंदर ही 1 अप्रैल 2015 को दिल्ली कैबिनेट ने एंटी-करप्शन ब्यूरो में 259 नई भर्तियां करने पर मुहर लगाई। इसी मीटिंग में सीक्रेट सर्विस फंड को 1.5 लाख रुपये से बढ़ाकर 20 लाख करने का प्रस्ताव हुआ। मीटिंग में एकाउंट्स से लेकर, इनकम टैक्स, इंजीनियरिंग और लीगल प्रोफेशनल्स की भर्ती पर भी बात हुई। यह प्लान तैयार हुआ कि इस सीक्रेट एजेंसी के लिए हाईटेक जासूसी उपकरण खरीदे जाएंगे। ऐसे साजोसामान आमतौर पर सीबीआई और आईबी जैसे एजेंसियां ही इस्तेमाल करती हैं। 29 सितंबर 2015 को हुई कैबिनेट बैठक में सतर्कता निदेशालय के तहत एक विभाग बनाने की बात हुई, जिसे हाथों-हाथ मंजूरी भी मिल गई। इस नए विभाग के बारे में केजरीवाल और उनके मंत्रियों के अलावा किसी को जानकारी नहीं होने दी गई। इसका नाम रखा गया फीडबैक यूनिट। इस यूनिट में इस साल फरवरी तक करीब 20 लोग काम भी कर रहे थे। बाद में कुछ और लोगों की भी भर्ती हुई। जो लोग चुने गए थे उनकी योग्यता का कोई पैमाना नहीं था। उनकी इकलौती काबिलियत यह थी कि वो आम आदमी पार्टी से जुड़े थे। दिल्ली सरकार के मुख्य सचिव सरकार के चीफ विजिलेंस ऑफिसर भी होते हैं, लेकिन उन्हें भी इस कदम की कोई जानकारी नहीं दी गई। दिल्ली के प्रशासनिक प्रमुख नजीब जंग को भी इस यूनिट के बारे में पहली बार इस साल अगस्त में पता चला।
4. सलाहकारों के नाम पर सफेद हाथी पाले!
जासूसी की तर्ज पर ही केजरीवाल सरकार ने एक क्रिएटिव यूनिट भी बनाया है। कहा गया कि ये सरकारी प्रोजेक्ट्स के लिए सलाहकार का काम करेंगे। दो साल की अवधि के लिए बनाई गई इस यूनिट में एक्सपर्ट प्रोफेशनल्स की भर्ती की बात कही गई थी। लेकिन इसके लिए दिल्ली की एक रिक्रूटमेंट फर्म सोनी डिटेक्टिव एंड एलाइड सर्विसेज के जरिए भर्तियां की गईं। जबकि इस फर्म को सिक्योरिटी गार्ड जैसी भर्तियों का ही तजुर्बा था। हैरत की बात यह रही कि इस टीम के लोगों को सैलरी बारापुला एलिवेटेड रोज के थर्ड फेज के बजट में से तय की गई। जाहिर है यह नियमों का सरासर उल्लंघन था। सरकार के इसी रवैये का नतीजा है कि सराय काले खां से मयूर विहार तक बारापुला एलिवेटेड फ्लाईवे बेहद सुस्त रफ्तार से बन रहा है और इसकी वजह से लाखों लोगों को रोज घंटों ट्रैफिक जाम में फंसना पड़ रहा है।
बारापुला एलिवेटेड रोड बनने की वजह से दिल्ली और नोएडा के बीच रोज घंटों जाम लगा रहता है। यह सड़क बेहद धीमी रफ्तार से बन रही है। जिसका खामियाजा रोज लाखों लोगों को भुगतना पड़ रहा है।
5. अय्याशी में बड़े-बड़े भ्रष्टाचारी पीछे छूटे
जब तक सत्ता नहीं मिली आम आदमी पार्टी के नेता किफायती दिखने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। विदेशी एजेंसियों से मिल रहे चंदे के कारण ठीक-ठाक अमीर होने के बावजूद केजरीवाल टूटी हुई सैंडल और घिसी हुई पैंट पहनते रहे। पहली बार सीएम बनने के बाद दिखावे के लिए वैगन आर कार से सफर किया, लेकिन दूसरे कार्यकाल में ये सारे भ्रम टूट गए। सरकार की सालगिरह पर केजरीवाल ने अपने बंगले के लॉन में एक शानदार पार्टी दी। इस पार्टी का मेन्यू ऐसा था कि टाटा, बिरला और अंबानी भी शरमा जाएं। 11 और 12 फरवरी को हुई इस पार्टी में केटरिंग का अरेंजमेंट सरकारी कंपनी दिल्ली टूरिज्म एंड ट्रांसपोर्टेशन डेवलपमेंट कॉरपोरेशन (DTTDC) को सौंपा गया था। DTTDC ने इस पार्टी के लिए दिल्ली के सबसे महंगे ताज पैलेस होटल को ठेका दिया। इस पार्टी में जो खाना परोसा गया वो करीब 12 हजार रुपये प्रति प्लेट पड़ता है। जबकि नियमों के मुताबिक ऐसी पार्टियों में प्रति प्लेट खर्च 2500 रुपये ही हो सकता है। साथ ही पार्टी पर कुल खर्च 4.5 लाख रुपये से ज्यादा नहीं होना चाहिए। DTTDC ने इस पार्टी के लिए दोगुने से भी ज्यादा 11.04 लाख का बिल दिया तो सरकार ने यह कहना शुरू कर दिया कि हमें डिस्काउंट दो। जिसके बाद पहले से ही बदहाल इस सरकारी कंपनी ने डिस्काउंट देते हुए बिल 9.9 लाख कर दिया।
6. केजरीवाल का भी एक ‘रॉबर्ट वाड्रा’ है!
6 अगस्त 2015 को निकुंज अग्रवाल नाम के एक डॉक्टर ने दिल्ली सरकार के चाचा नेहरू बाल चिकित्सालय में नौकरी के लिए आवेदन जमा किया। इस एप्लिकेशन में ग्रामर की ढेर सारी गलतियां थीं। इसके बावजूद डॉक्टर साहब को 4 दिन के अंदर अप्वाइंटमेंट लेटर मिल गया। वो भी तब जब अस्पताल में डॉक्टरों की कोई वैकेंसी नहीं थी। इसके एक महीने से भी कम समय में 4 सितंबर 2015 को निकुंज अग्रवाल को स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन का ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (ओएसडी) बना दिया गया। अगर आप सोच रहे हैं कि डॉक्टर निकुंज अग्रवाल में ऐसी क्या खूबी थी कि कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारी होने के बावजूद उन्हें इस अहम पद के लिए चुना गया, तो इसका जवाब यह है कि वो केजरीवाल की साली की बेटी के पति (रिश्ते में दामाद) हैं। डॉक्टर अग्रवाल पर मेहरबानी यहीं खत्म नहीं हुई। उनको अब तक चार बार एक्सटेंशन मिल चुका है। कॉन्ट्रैक्ट इंप्लाई होने के बावजूद इस सरकारी दामाद को आईआईएम अहमदाबाद में मैनेजमेंट डेवलपमेंट प्रोग्राम के लिए भेजा गया। इस कोर्स की फीस 1.15 लाख रुपये है। आम तौर पर इसके लिए सीनियर अधिकारियों को ही भेजा जाता है। नियमों के मुताबिक निकुंज अग्रवाल को इस ट्रेनिंग के लिए भेजा ही नहीं जा सकता। डॉक्टर साहब ने इसी दौरान जनता के पैसे पर चीन की सैर भी की।
7. सिक्योरिटी गार्ड्स की भर्ती में बड़ा गबन!
दिल्ली सरकार ने सरकारी अस्पतालों में तैनाती के लिए मोटी सैलरी पर सिक्योरिटी गार्डों की भी भर्ती की। तर्क दिया गया कि डॉक्टरों पर हमले बढ़ रहे हैं। लेकिन इसके लिए टेंडर की प्रक्रिया पूरी नहीं की गई। चूंकि इस पूरी प्रक्रिया को बेहद गुपचुप तरीके से किया गया तो इससे यह शक मजबूत होता है कि भर्ती में ज्यादातर आप कार्यकर्ताओं को ही एडजस्ट किया गया होगा। जिन तीन सिक्योरिटी एजेंसियों को इसके ठेके मिले वो थीं- नाइटवॉच, इनोविज़न और SIS इंडिया। ये तीनों वही कंपनी हैं जिन्हें ये सर्वे करने की भी जिम्मेदारी दी गई कि दिल्ली के अस्पतालों में कितने सिक्योरिटी स्टाफ रखने की जरूरत है। यह सीधे-सीधे कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट का मामला है। गार्ड्स की सैलरी सिक्योरिटी एजेंसीज़ ने अपनी मर्जी से तय कर ली। इसमें 8.3 फीसदी बोनस और 4.8 फीसदी ग्रैच्युटी भी रखी। जबकि इस तरह के बेनेफिट्स कम से कम 6 महीने का प्रोबेशन बीतने के बाद ही मिलता है।
8. अपने प्रचार पर पानी की तरह बहाए पैसे
इस साल जुलाई में शुरू हुए ‘टाक टु एके’ प्रोग्राम के लिए देशभर में जोरदार ऑनलाइन प्रचार किया गया। इसमें भी बड़े पैमाने पर धांधली हुई। इसी का नतीजा रहा कि इस अभियान के लिए जिस परफेक्ट रिलेशंस नाम की कंपनी को ठेका दिया गया था उसका पेमेंट रुका हुआ है और नई पीआर एजेंसी की तलाश की जा रही है। दिखाया गया था कि जनता के सवाल लाइव लिए जा रहे हैं लेकिन सच्चाई यह थी कि प्रोग्राम पहले से फिक्स था। दिल्ली के जरूरतमंदों के बजाय पंजाब और गोवा के सवाल लिए गए। ये सवाल भी दिल्ली में बैठे आम आदमी पार्टी के ही वॉलेंटियर पूछ रहे थे। इस बारे में भी न्यूज़लूज़ ने उसी दिन खुलासा किया था।
पढ़ें रिपोर्ट: टॉक टु एके फिक्स था, देखिए वीडियो
9. बड़े मंत्रियों को विदेश घूमने का चस्का
डिप्टी सीएम मनीष सिसोदिया और स्वास्थ्यमंत्री सत्येंद्र जैन विदेशों में सैर-सपाटे के मामले में सबसे आगे हैं। दस्तावेजों के मुताबिक सिसोदिया पिछले साल 4 लोगों के साथ ब्राजील की यात्रा पर गए थे। कहा गया कि वहां पर 11 से 16 अगस्त तक एक सेमिनार में वो हिस्सा लेंगे। इस सेमिनार में सिसोदिया ने क्या किया यह तो किसी को नहीं पता, लेकिन उन्होंने अपनी यात्रा के रूट में अर्जेंटीना भी जुड़वा लिया। वहां पर वो इग्वाजू फॉल की सैर पर गए। लेकिन यात्रा के लिए तय नियम-कायदे पूरे नहीं किए गए। सिसोदिया के इस शौक का नतीजा यह हुआ कि सरकारी खजाने को 29 लाख रुपये से ज्यादा का अतिरिक्त बोझ पड़ा। ओपन मैगजीन की रिपोर्ट के मुताबिक सिसोदिया के साथ जो चार लोग गए थे उनमें से सिर्फ एक उस विषय के एक्सपर्ट थे। पहली ही नजर में समझ में आ जाता है कि बाकी सभी सिर्फ विदेश घूमने की नीयत से गए थे। आम तौर पर ऐसी सरकारी यात्राएं एयर इंडिया से होती हैं, लेकिन सिसोदिया ने विदेशी एयरलाइन केएलएम के बिजनेस क्लास को चुना, ताकि वो ज्यादा ऐशो-आराम के साथ सफर कर सकें।
अगले ही महीने सितंबर में सिसोदिया ने ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड की यात्रा की। इस बार भी उन्होंने एयर इंडिया के बजाय सिंगापुर एयरलाइंस में बिजनेस क्लास की टिकट बुक कराई। इस साल मार्च में उन्होंने लंदन का टूर किया। बताया गया कि वहां पर वो लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में 1 दिन के सेमिनार में हिस्सा लेंगे, लेकिन उनकी यात्रा 4 दिन की रखी गई। 17 मार्च से 20 मार्च तक सिसोदिया ने अपने सेक्रेटरी के साथ लंदन में जमकर सैर-सपाटा किया। बाद में पता चला कि यह सेमिनार भी लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स का न होकर वहां पढ़ने वाले कुछ भारतीय छात्रों का कार्यक्रम था। जिसके लिए सरकारी खर्चे पर यात्रा नहीं की जा सकती। (हमारे सूत्रों के मुताबिक इस यात्रा में सिसोदिया ने खालिस्तानी अलगाववादी गुटों से पंजाब चुनाव में मदद के सिलसिले में मुलाकात भी की थी।)
अब तक मनीष सिसोदिया को विदेश घूमने का मानो चस्का लग चुका था। मई में फिर से उन्होंने अगली यूरोप यात्रा का बहाना ढूंढ लिया। इस बार 30 मई से 3 जून तक जर्मनी घूमने का प्रोग्राम रखा गया। कहा गया कि जर्मनी हैबिटेट फोरम में उनको हिस्सा लेना है। जबकि इसका विषय ऐसा कुछ नहीं था जिसका दिल्ली के लोगों से कुछ भी लेना-देना हो। सिसोदिया के साथ जो दो लोग ले जाए गए उनके लिए भी कोई मंजूरी वगैरह नहीं ली गई। बाकी यात्राओं की तरह इसके लिए भी एलजी से जरूरी मंजूरी नहीं थी।
मनीष सिसोदिया की तरह सत्येंद्र जैन को भी जनता के पैसे विदेशों में उड़ाने का चस्का लगा हुआ है। सत्येंद्र जैन ने इस साल 12 से 15 मार्च तक मलेशिया की सैर की। बताया कि वो वहां पर रैपिड ट्रांसपोर्ट कॉरीडोर (दिल्ली में इसे पहले से ही बीआरटी के नाम से जाना जाता है।) के स्टडी टूर पर जा रहे हैं। सत्येंद्र जैन ने 5 लोगों के साथ बिजनेस क्लास की टिकट बुक कराई। जब उनसे अपनी टीम का साइज कुछ कम करने को कहा गया तो उन्होंने अपने बीच में से इकलौते एक्सपर्ट का नाम कटवा दिया।
सत्येंद्र जैन पिछले साल 25 से 29 जून तक स्वीडेन की राजधानी
स्टॉकहोम में ‘स्टडी’ टूर पर रहे थे। वहां पर वो दिल्ली में भारतीय राजदूत के एक मौखिक बुलावे पर पहुंच गए थे। इस यात्रा में उनके साथ ट्रांसपोर्ट मंत्री गोपाल राय समेत कुल 11 लोग थे। इस दौरान ये लोग
यूके भी गए और इस सबके लिए कोई मंजूरी लेने की जरूरत नहीं समझी। एक और गौर करने वाली बात है कि केजरीवाल एंड कंपनी की विदेश यात्राओं में मेजबानी ज्यादातर सिख संगठनों ने की। ऐसे सिख संगठन, जिनका झुकाव खालिस्तान की तरफ माना जाता है।
यह भी पढ़ें: देखिए कैसे विदेश में ऐश कर रही है केजरीवाल एंड कंपनी
ओपन मैगजीन ने जो बातें छापी हैं उनमें से कई पहले से लोगों की जानकारी में आ चुकी हैं। नई बात यह है कि मैगजीन की रिपोर्ट में इन सारे आरोपों के पक्ष में दस्तावेज पेश किए गए हैं। हालांकि हम इनकी स्वतंत्र तौर पर पुष्टि नहीं कर रहे हैं। फिलहाल केजरीवाल सरकार ने भी अब तक इन आरोपों पर कोई सफाई नहीं दी है। वैसे एक पहलू यह भी है कि केजरीवाल सरकार की करतूतों की लिस्ट इससे भी कहीं अधिक लंबी है। मिसाल के तौर पर अभी हाल ही में फिनलैंड दौरे पर गए मनीष सिसोदिया की यात्रा के बारे में हमें कुछ एक्सक्लूसिव जानकारियां हाथ लगी हैं। इस बारे में भी हम न्यूज़लूज़ पर बहुत जल्द एक रिपोर्ट पब्लिश करने वाले हैं।

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प्राचीन भारत

विद्वानों का मानना है कि प्राचीन भारत में महिलाओं को जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ बराबरी का दर्जा हासिल था।[10]हालांकि कुछ अन्य विद्वानों का नज़रिया इसके विपरीत है।[11] पतंजलि और कात्यायन जैसे प्राचीन भारतीय व्याकरणविदों का कहना है कि प्रारम्भिक वैदिक काल[12][13] में महिलाओं को शिक्षा दी जाती थी। ऋग्वेदिक ऋचाएं यह बताती हैं कि महिलाओं की शादी एक परिपक्व उम्र में होती थी और संभवतः उन्हें अपना पति चुनने की भी आजादी थी।[14] ऋग्वेद और उपनिषद जैसे ग्रंथ कई महिला साध्वियों और संतों के बारे में बताते हैं जिनमें गार्गी और मैत्रेयी के नाम उल्लेखनीय हैं।[15]

प्राचीन भारत के कुछ साम्राज्यों में नगरवधु (“नगर की दुल्हन”) जैसी परंपराएं मौजूद थीं। महिलाओं में नगरवधु के प्रतिष्ठित सम्मान के लिये प्रतियोगिता होती थी। आम्रपाली नगरवधु का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण रही है।

अध्ययनों के अनुसार प्रारंभिक वैदिक काल में महिलाओं को बराबरी का दर्जा और अधिकार मिलता था।[16] हालांकि बाद में (लगभग 500 ईसा पूर्व में) स्मृतियों (विशेषकर मनुस्मृति) के साथ महिलाओं की स्थिति में गिरावट आनी शुरु हो गयी और बाबर एवं मुगलसाम्राज्य के इस्लामी आक्रमण के साथ और इसके बाद ईसाइयत ने महिलाओं की आजादी और अधिकारों को सीमित कर दिया.[7]

हालांकि जैन धर्म जैसे सुधारवादी आंदोलनों में महिलाओं को धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने की अनुमति दी गयी है, भारत में महिलाओं को कमोबेश दासता और बंदिशों का ही सामना करना पडा है।[16] माना जाता है कि बाल विवाह की प्रथा छठी शताब्दी के आसपास शुरु हुई थी।[17]

मध्ययुगीन काल

समाज में भारतीय महिलाओं की स्थिति में मध्ययुगीन काल के दौरान और अधिक गिरावट आयी[10][7] जब भारत के कुछ समुदायों में सती प्रथा, बाल विवाह और विधवा पुनर्विवाह पर रोक, सामाजिक जिंदगी का एक हिस्सा बन गयी थी। भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों की जीत ने परदा प्रथा को भारतीय समाज में ला दिया. राजस्थान के राजपूतों में जौहर की प्रथा थी। भारत के कुछ हिस्सों में देवदासियां या मंदिर की महिलाओं को यौन शोषण का शिकार होना पड़ा था। बहुविवाह की प्रथा हिन्दू क्षत्रिय शासकों में व्यापक रूप से प्रचलित थी।[17] कई मुस्लिम परिवारों में महिलाओं को जनाना क्षेत्रों तक ही सीमित रखा गया था।

इन परिस्थितियों के बावजूद भी कुछ महिलाओं ने राजनीति, साहित्य, शिक्षा और धर्म के क्षेत्रों में सफलता हासिल की.[7] रज़िया सुल्तान दिल्ली पर शासन करने वाली एकमात्र महिला सम्राज्ञी बनीं. गोंड की महारानी दुर्गावती ने 1564 में मुगल सम्राट अकबर के सेनापति आसफ़ खान से लड़कर अपनी जान गंवाने से पहले पंद्रह वर्षों तक शासन किया था। चांद बीबी ने 1590 के दशक में अकबर की शक्तिशाली मुगल सेना के खिलाफ़ अहमदनगर की रक्षा की. जहांगीर की पत्नी नूरजहाँ ने राजशाही शक्ति का प्रभावशाली ढंग से इस्तेमाल किया और मुगल राजगद्दी के पीछे वास्तविक शक्ति के रूप में पहचान हासिल की. मुगल राजकुमारी जहाँआरा और जेबुन्निसा सुप्रसिद्ध कवियित्रियाँ थीं और उन्होंने सत्तारूढ़ प्रशासन को भी प्रभावित किया। शिवाजी की माँ जीजाबाई को एक योद्धा और एक प्रशासक के रूप में उनकी क्षमता के कारण क्वीन रीजेंट के रूप में पदस्थापित किया गया था। दक्षिण भारत में कई महिलाओं ने गाँवों, शहरों और जिलों पर शासन किया और सामाजिक एवं धार्मिक संस्थानों की शुरुआत की.[17]

भक्ति आंदोलन ने महिलाओं की बेहतर स्थिति को वापस हासिल करने की कोशिश की और प्रभुत्व के स्वरूपों पर सवाल उठाया.[16]एक महिला संत-कवियित्री मीराबाई भक्ति आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण चेहरों में से एक थीं। इस अवधि की कुछ अन्य संत-कवियित्रियों में अक्का महादेवी, रामी जानाबाई और लाल देद शामिल हैं। हिंदुत्व के अंदर महानुभाव, वरकारी और कई अन्य जैसे भक्ति संप्रदाय, हिंदू समुदाय में पुरुषों और महिलाओं के बीच सामाजिक न्याय और समानता की खुले तौर पर वकालत करने वाले प्रमुख आंदोलन थे।

भक्ति आंदोलन के कुछ ही समय बाद सिक्खों के पहले गुरु, गुरु नानक ने भी पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता के संदेश को प्रचारित किया। उन्होंने महिलाओं को धार्मिक संस्थानों का नेतृत्व करने; सामूहिक प्रार्थना के रूप में गाये जाने वाले वाले कीर्तन याभजन को गाने और इनकी अगुआई करने; धार्मिक प्रबंधन समितियों के सदस्य बनने; युद्ध के मैदान में सेना का नेतृत्व करने; विवाह में बराबरी का हक और अमृत (दीक्षा) में समानता की अनुमति देने की वकालत की. अन्य सिख गुरुओं ने भी महिलाओं के प्रति भेदभाव के खिलाफ उपदेश दिए.

ऐतिहासिक प्रथाए

कुछ समुदायों में सती, जौहर और देवदासी जैसी परंपराओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और आधुनिक भारत में ये काफ़ी हद तक समाप्त हो चुकी हैं। हालांकि इन प्रथाओं के कुछ मामले भारत के ग्रामीण इलाकों में आज भी देखे जाते हैं। कुछ समुदायों में भारतीय महिलाओं द्वारा परदा प्रथा को आज भी जीवित रखा गया है और विशेषकर भारत के वर्तमान कानून के तहत एक गैरकानूनी कृत्य होने के बावजूद बाल विवाह की प्रथा आज भी प्रचलित है।

सती

सती प्रथा एक प्राचीन और काफ़ी हद तक विलुप्त रिवाज है, कुछ समुदायों में विधवा को अपने पति की चिता में अपनी जीवित आहुति देनी पड़ती थी। हालांकि यह कृत्य विधवा की ओर से स्वैच्छिक रूप से किये जाने की उम्मीद की जाती थी, ऐसा माना जाता है कि कई बार इसके लिये विधवा को मजबूर किया जाता था। 1829 में अंग्रेजों ने इसे समाप्त कर दिया. आजादी के बाद से सती होने के लगभग चालीस मामले प्रकाश में आये हैं।[18] 1987 में राजस्थान की रूपकंवर का मामला सती प्रथा (रोक) अधिनियम का कारण बना.[19]

जौहर

जौहर का मतलब सभी हारे हुए (सिर्फ राजपूत) योद्धाओं की पत्नियों और बेटियों के शत्रु द्वारा बंदी बनाये जाने और इसके बाद उत्पीड़न से बचने के लिये स्वैच्छिक रूप से अपनी आहुति देने की प्रथा है। अपने सम्मान के लिए मर-मिटने वाले पराजित राजपूत शासकों की पत्नियों द्वारा इस प्रथा का पालन किया जाता था। यह कुप्रथा केवल भारतीय राजपूतोंशासक वर्ग तक सीमित थी प्रारंभ में और राजपूतों ने या शायद एक-आध किसी दूसरी जाति की स्त्री ने सति (पति/पिता की मृत्यु होने पर उसकी चिता में जीवित जल जाना) जिसे उस समय के समाज का एक वर्ग पुनीत धार्मिक कार्य मानने लगा था। कभी भी भारत की दूसरी लडाका कोमो या जिन्हे ईन्गलिश में “मार्शल कौमे” माना गया उनमें यह कुप्रथा कभी भी कोई स्थान न पा सकी। जाटों की स्त्रीयां युद्ध क्षेत्र में पति के कन्धे से कन्धा मिला दुश्मनों के दान्त खट्टे करते हुए शहीद हो जाती थी। मराठा महिलाएँ भी अपने योधा पति की युधभूमि में पूरा साथ देती रही हैं।

परदा

परदा वह प्रथा है जिसमें कुछ समुदायों में महिलाओं को अपने तन को इस प्रकार से ढंकना जरूरी होता है कि उनकी त्वचा और रूप-रंग का किसी को अंदाजा ना लगे. यह महिलाओं के क्रियाकलापों को सीमित कर देता है; यह आजादी से मिलने-जुलने के उनके अधिकार को सीमित करता है और यह महिलाओं की अधीनता का एक प्रतीक है। आम धारणा के विपरीत यह ना तो हिंदुओं और ना ही मुसलमानों के धार्मिक उपदेशों को प्रतिबिंबित करता है, हालांकि दोनों संप्रदायों के धार्मिक नेताओं की लापरवाही और पूर्वाग्रहों के कारण गलतफ़हमी पैदा हुई है।

देवदासी

देवदासी दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में एक धार्मिक प्रथा है जिसमें देवता या मंदिर के साथ महिलाओं की “शादी” कर दी जाती है। यह परंपरा दसवीं सदी ए.डी. तक अच्छी तरह अपनी पैठ जमा जुकी थी।[20] बाद की अवधि में देवदासियों का अवैध यौन उत्पीडन भारत के कुछ हिस्सों में एक रिवाज बन गया।

अंग्रेजी शासन

यूरोपीय विद्वानों ने 19वीं सदी में यह महसूस किया था कि हिंदू महिलाएं “स्वाभाविक रूप से मासूम” और अन्य महिलाओं से “अधिक सच्चरित्र” होती हैं।[21] अंग्रेजी शासन के दौरान राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फ़ुले, आदि जैसे कई सुधारकों ने महिलाओं के उत्थान के लिये लड़ाइयाँ लड़ीं. हालांकि इस सूची से यह पता चलता है कि राज युग में अंग्रेजों का कोई भी सकारात्मक योगदान नहीं था, यह पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि मिशनरियों की पत्नियाँ जैसे कि मार्था मौल्ट नी मीड और उनकी बेटी एलिज़ा काल्डवेल नी मौल्ट को दक्षिण भारत में लडकियों की शिक्षा और प्रशिक्षण के लिये आज भी याद किया जाता है – यह एक ऐसा प्रयास था जिसकी शुरुआत में स्थानीय स्तर पर रुकावटों का सामना करना पड़ा क्योंकि इसे परंपरा के रूप में अपनाया गया था। 1829 में गवर्नर-जनरल विलियम केवेंडिश-बेंटिक के तहत राजा राम मोहन राय के प्रयास सती प्रथा के उन्मूलन का कारण बने. विधवाओं की स्थिति को सुधारने में ईश्वर चंद्र विद्यासागर के संघर्ष का परिणाम विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1956 के रूप में सामने आया। कई महिला सुधारकों जैसे कि पंडिता रमाबाई ने भी महिला सशक्तीकरण के उद्देश्य को हासिल करने में मदद की.

कर्नाटक में कित्तूर रियासत की रानी, कित्तूर चेन्नम्मा ने समाप्ति के सिद्धांत (डाक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स) की प्रतिक्रिया में अंग्रेजों के खिलाफ़ सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया। तटीय कर्नाटक की महारानी अब्बक्का रानी ने 16वीं सदी में हमलावर यूरोपीय सेनाओं, उल्लेखनीय रूप से पुर्तगाली सेना के खिलाफ़ सुरक्षा का नेतृत्व किया। झाँसी की महारानी रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ़ 1857 के भारतीय विद्रोह का झंडा बुलंद किया। आज उन्हें सर्वत्र एक राष्ट्रीय नायिका के रूप में माना जाता है। अवध की सह-शासिका बेगम हज़रत महल एक अन्य शासिका थी जिसने 1857 के विद्रोह का नेतृत्व किया था। उन्होंने अंग्रेजों के साथ सौदेबाजी से इनकार कर दिया और बाद में नेपाल चली गयीं. भोपाल की बेगमें भी इस अवधि की कुछ उल्लेखनीय महिला शासिकाओं में शामिल थीं। उन्होंने परदा प्रथा को नहीं अपनाया और मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण भी लिया।

चंद्रमुखी बसु, कादंबिनी गांगुली और आनंदी गोपाल जोशी कुछ शुरुआती भारतीय महिलाओं में शामिल थीं जिन्होंने शैक्षणिक डिग्रियाँ हासिल कीं.

1917 में महिलाओं के पहले प्रतिनिधिमंडल ने महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों की माँग के लिये विदेश सचिव से मुलाक़ात की जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन हासिल था। 1927 में अखिल भारतीय महिला शिक्षा सम्मेलन का आयोजन पुणे में किया गया था।[16] 1929 में मोहम्मद अली जिन्ना के प्रयासों से बाल विवाह निषेध अधिनियम को पारित किया गया जिसके अनुसार एक लड़की के लिये शादी की न्यूनतम उम्र चौदह वर्ष निर्धारित की गयी थी।[16][22] हालांकि महात्मा गाँधी ने स्वयं तेरह वर्ष की उम्र में शादी की, बाद में उन्होंने लोगों से बाल विवाहों का बहिष्कार करने का आह्वान किया और युवाओं से बाल विधवाओं के साथ शादी करने की अपील की.[23]

भारत की आजादी के संघर्ष में महिलाओं ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. भिकाजी कामा, डॉ॰ एनी बेसेंट, प्रीतिलता वाडेकर, विजयलक्ष्मी पंडित, राजकुमारी अमृत कौर, अरुना आसफ़ अली, सुचेता कृपलानी और कस्तूरबा गाँधी कुछ प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल हैं। अन्य उल्लेखनीय नाम हैं मुथुलक्ष्मी रेड्डी, दुर्गाबाई देशमुख आदि. सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी की झाँसी की रानी रेजीमेंट कैप्टेन लक्ष्मी सहगल सहित पूरी तरह से महिलाओं की सेना थी। एक कवियित्री और स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला और भारत के किसी राज्य की पहली महिला राज्यपाल थीं।

स्वतंत्र भारत

भारत में महिलाएं अब सभी तरह की गतिविधियों जैसे कि शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला और संस्कृति, सेवा क्षेत्र, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आदि में हिस्सा ले रही हैं।[7] इंदिरा गांधी जिन्होंने कुल मिलाकर पंद्रह वर्षों तक भारत के प्रधानमंत्री के रूप में सेवा की, दुनिया की सबसे लंबे समय तक सेवारत महिला प्रधानमंत्री हैं।[24]

भारत का संविधान सभी भारतीय महिलाओं को सामान अधिकार (अनुच्छेद 14), राज्य द्वारा कोई भेदभाव नहीं करने (अनुच्छेद 15 (1)), अवसर की समानता (अनुच्छेद 16), समान कार्य के लिए समान वेतन (अनुच्छेद 39 (घ)) की गारंटी देता है। इसके अलावा यह महिलाओं और बच्चों के पक्ष में राज्य द्वारा विशेष प्रावधान बनाए जाने की अनुमति देता है (अनुच्छेद 15(3)), महिलाओं की गरिमा के लिए अपमानजनक प्रथाओं का परित्याग करने (अनुच्छेद 51(ए)(ई)) और साथ ही काम की उचित एवं मानवीय परिस्थितियाँ सुरक्षित करने और प्रसूति सहायता के लिए राज्य द्वारा प्रावधानों को तैयार करने की अनुमति देता है। (अनुच्छेद 42)].[25]

भारत में नारीवादी सक्रियता ने 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध के दौरान रफ़्तार पकड़ी. महिलाओं के संगठनों को एक साथ लाने वाले पहले राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों में से एक मथुरा बलात्कार का मामला था। एक थाने (पुलिस स्टेशन) में मथुरा नामक युवती के साथ बलात्कार के आरोपी पुलिसकर्मियों के बरी होने की घटना 1979-1980 में एक बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों का कारण बनी. विरोध प्रदर्शनों को राष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से कवर किया गया और सरकार को साक्ष्य अधिनियम, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता को संशोधित करने और हिरासत में बलात्कार की श्रेणी को शामिल करने के लिए मजबूर किया गया।[25] महिला कार्यकर्ताएं कन्या भ्रूण हत्या, लिंग भेद, महिला स्वास्थ्य और महिला साक्षरता जैसे मुद्दों पर एकजुट हुईं.

चूंकि शराब की लत को भारत में अक्सर महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जोड़ा जाता है,[26] महिलाओं के कई संगठनों ने आंध्र प्रदेश,हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में शराब-विरोधी अभियानों की शुरुआत की.[25] कई भारतीय मुस्लिम महिलाओं ने शरीयत कानून के तहत महिला अधिकारों के बारे में रूढ़िवादी नेताओं की व्याख्या पर सवाल खड़े किये और तीन तलाक की व्यवस्था की आलोचना की.[16]

1990 के दशक में विदेशी दाता एजेंसियों से प्राप्त अनुदानों ने नई महिला-उन्मुख गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ) के गठन को संभव बनाया. स्वयं-सहायता समूहों एवं सेल्फ इम्प्लॉयड वुमेन्स एसोसिएशन (सेवा) जैसे एनजीओ ने भारत में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक प्रमुख भूमिका निभाई है। कई महिलाएं स्थानीय आंदोलनों की नेताओं के रूप में उभरी हैं। उदाहरण के लिए, नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर.

भारत सरकार ने 2001 को महिलाओं के सशक्तीकरण (स्वशक्ति) वर्ष के रूप में घोषित किया था।[16] महिलाओं के सशक्तीकरण की राष्ट्रीय नीति 2001 में पारित की गयी थी।[27]

2006 में बलात्कार की शिकार एक मुस्लिम महिला इमराना की कहानी मीडिया में प्रचारित की गयी थी। इमराना का बलात्कार उसके ससुर ने किया था। कुछ मुस्लिम मौलवियों की उन घोषणाओं का जिसमें इमराना को अपने ससुर से शादी कर लेने की बात कही गयी थी, व्यापक रूप से विरोध किया गया और अंततः इमराना के ससुर को 10 साल की कैद की सजा दी गयी। कई महिला संगठनों और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा इस फैसले का स्वागत किया गया।[28]

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के एक दिन बाद, 9 मार्च 2010 को राज्यसभा ने महिला आरक्षण बिल को पारित कर दिया जिसमें संसद और राज्य की विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की व्यवस्था है।[29]

प्राचीन भारत
विद्वानों का मानना है कि प्राचीन भारत में महिलाओं को जीवन के सभी क्षेत्रों में पुरुषों के साथ बराबरी का दर्जा हासिल था।[10] हालांकि कुछ अन्य विद्वानों का नज़रिया इसके विपरीत है।[11] पतंजलि और कात्यायन जैसे प्राचीन भारतीय व्याकरणविदों का कहना है कि प्रारम्भिक वैदिक काल[12][13] में महिलाओं को शिक्षा दी जाती थी। ऋग्वेदिक ऋचाएं यह बताती हैं कि महिलाओं की शादी एक परिपक्व उम्र में होती थी और संभवतः उन्हें अपना पति चुनने की भी आजादी थी।[14] ऋग्वेद और उपनिषद जैसे ग्रंथ कई महिला साध्वियों और संतों के बारे में बताते हैं जिनमें गार्गी और मैत्रेयी के नाम उल्लेखनीय हैं।[15]

प्राचीन भारत के कुछ साम्राज्यों में नगरवधु (“नगर की दुल्हन”) जैसी परंपराएं मौजूद थीं। महिलाओं में नगरवधु के प्रतिष्ठित सम्मान के लिये प्रतियोगिता होती थी। आम्रपाली नगरवधु का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण रही है।

अध्ययनों के अनुसार प्रारंभिक वैदिक काल में महिलाओं को बराबरी का दर्जा और अधिकार मिलता था।[16] हालांकि बाद में (लगभग 500 ईसा पूर्व में) स्मृतियों (विशेषकर मनुस्मृति) के साथ महिलाओं की स्थिति में गिरावट आनी शुरु हो गयी और बाबर एवं मुगल साम्राज्य के इस्लामी आक्रमण के साथ और इसके बाद ईसाइयत ने महिलाओं की आजादी और अधिकारों को सीमित कर दिया.[7]

हालांकि जैन धर्म जैसे सुधारवादी आंदोलनों में महिलाओं को धार्मिक अनुष्ठानों में शामिल होने की अनुमति दी गयी है, भारत में महिलाओं को कमोबेश दासता और बंदिशों का ही सामना करना पडा है।[16] माना जाता है कि बाल विवाह की प्रथा छठी शताब्दी के आसपास शुरु हुई थी।[17]

मध्ययुगीन काल
देवी राधारानी के चरणों में कृष्ण
समाज में भारतीय महिलाओं की स्थिति में मध्ययुगीन काल के दौरान और अधिक गिरावट आयी[10][7] जब भारत के कुछ समुदायों में सती प्रथा, बाल विवाह और विधवा पुनर्विवाह पर रोक, सामाजिक जिंदगी का एक हिस्सा बन गयी थी। भारतीय उपमहाद्वीप में मुसलमानों की जीत ने परदा प्रथा को भारतीय समाज में ला दिया. राजस्थान के राजपूतों में जौहर की प्रथा थी। भारत के कुछ हिस्सों में देवदासियां या मंदिर की महिलाओं को यौन शोषण का शिकार होना पड़ा था। बहुविवाह की प्रथा हिन्दू क्षत्रिय शासकों में व्यापक रूप से प्रचलित थी।[17] कई मुस्लिम परिवारों में महिलाओं को जनाना क्षेत्रों तक ही सीमित रखा गया था।

इन परिस्थितियों के बावजूद भी कुछ महिलाओं ने राजनीति, साहित्य, शिक्षा और धर्म के क्षेत्रों में सफलता हासिल की.[7] रज़िया सुल्तान दिल्ली पर शासन करने वाली एकमात्र महिला सम्राज्ञी बनीं. गोंड की महारानी दुर्गावती ने 1564 में मुगल सम्राट अकबर के सेनापति आसफ़ खान से लड़कर अपनी जान गंवाने से पहले पंद्रह वर्षों तक शासन किया था। चांद बीबी ने 1590 के दशक में अकबर की शक्तिशाली मुगल सेना के खिलाफ़ अहमदनगर की रक्षा की. जहांगीर की पत्नी नूरजहाँ ने राजशाही शक्ति का प्रभावशाली ढंग से इस्तेमाल किया और मुगल राजगद्दी के पीछे वास्तविक शक्ति के रूप में पहचान हासिल की. मुगल राजकुमारी जहाँआरा और जेबुन्निसा सुप्रसिद्ध कवियित्रियाँ थीं और उन्होंने सत्तारूढ़ प्रशासन को भी प्रभावित किया। शिवाजी की माँ जीजाबाई को एक योद्धा और एक प्रशासक के रूप में उनकी क्षमता के कारण क्वीन रीजेंट के रूप में पदस्थापित किया गया था। दक्षिण भारत में कई महिलाओं ने गाँवों, शहरों और जिलों पर शासन किया और सामाजिक एवं धार्मिक संस्थानों की शुरुआत की.[17]

भक्ति आंदोलन ने महिलाओं की बेहतर स्थिति को वापस हासिल करने की कोशिश की और प्रभुत्व के स्वरूपों पर सवाल उठाया.[16] एक महिला संत-कवियित्री मीराबाई भक्ति आंदोलन के सबसे महत्वपूर्ण चेहरों में से एक थीं। इस अवधि की कुछ अन्य संत-कवियित्रियों में अक्का महादेवी, रामी जानाबाई और लाल देद शामिल हैं। हिंदुत्व के अंदर महानुभाव, वरकारी और कई अन्य जैसे भक्ति संप्रदाय, हिंदू समुदाय में पुरुषों और महिलाओं के बीच सामाजिक न्याय और समानता की खुले तौर पर वकालत करने वाले प्रमुख आंदोलन थे।

भक्ति आंदोलन के कुछ ही समय बाद सिक्खों के पहले गुरु, गुरु नानक ने भी पुरुषों और महिलाओं के बीच समानता के संदेश को प्रचारित किया। उन्होंने महिलाओं को धार्मिक संस्थानों का नेतृत्व करने; सामूहिक प्रार्थना के रूप में गाये जाने वाले वाले कीर्तन या भजन को गाने और इनकी अगुआई करने; धार्मिक प्रबंधन समितियों के सदस्य बनने; युद्ध के मैदान में सेना का नेतृत्व करने; विवाह में बराबरी का हक और अमृत (दीक्षा) में समानता की अनुमति देने की वकालत की. अन्य सिख गुरुओं ने भी महिलाओं के प्रति भेदभाव के खिलाफ उपदेश दिए.

ऐतिहासिक प्रथाएं
कुछ समुदायों में सती, जौहर और देवदासी जैसी परंपराओं पर प्रतिबंध लगा दिया गया था और आधुनिक भारत में ये काफ़ी हद तक समाप्त हो चुकी हैं। हालांकि इन प्रथाओं के कुछ मामले भारत के ग्रामीण इलाकों में आज भी देखे जाते हैं। कुछ समुदायों में भारतीय महिलाओं द्वारा परदा प्रथा को आज भी जीवित रखा गया है और विशेषकर भारत के वर्तमान कानून के तहत एक गैरकानूनी कृत्य होने के बावजूद बाल विवाह की प्रथा आज भी प्रचलित है।

सती
सती प्रथा एक प्राचीन और काफ़ी हद तक विलुप्त रिवाज है, कुछ समुदायों में विधवा को अपने पति की चिता में अपनी जीवित आहुति देनी पड़ती थी। हालांकि यह कृत्य विधवा की ओर से स्वैच्छिक रूप से किये जाने की उम्मीद की जाती थी, ऐसा माना जाता है कि कई बार इसके लिये विधवा को मजबूर किया जाता था। 1829 में अंग्रेजों ने इसे समाप्त कर दिया. आजादी के बाद से सती होने के लगभग चालीस मामले प्रकाश में आये हैं।[18] 1987 में राजस्थान की रूपकंवर का मामला सती प्रथा (रोक) अधिनियम का कारण बना.[19]

जौहर
जौहर का मतलब सभी हारे हुए (सिर्फ राजपूत) योद्धाओं की पत्नियों और बेटियों के शत्रु द्वारा बंदी बनाये जाने और इसके बाद उत्पीड़न से बचने के लिये स्वैच्छिक रूप से अपनी आहुति देने की प्रथा है। अपने सम्मान के लिए मर-मिटने वाले पराजित राजपूत शासकों की पत्नियों द्वारा इस प्रथा का पालन किया जाता था। यह कुप्रथा केवल भारतीय राजपूतोंशासक वर्ग तक सीमित थी प्रारंभ में और राजपूतों ने या शायद एक-आध किसी दूसरी जाति की स्त्री ने सति (पति/पिता की मृत्यु होने पर उसकी चिता में जीवित जल जाना) जिसे उस समय के समाज का एक वर्ग पुनीत धार्मिक कार्य मानने लगा था। कभी भी भारत की दूसरी लडाका कोमो या जिन्हे ईन्गलिश में “मार्शल कौमे” माना गया उनमें यह कुप्रथा कभी भी कोई स्थान न पा सकी। जाटों की स्त्रीयां युद्ध क्षेत्र में पति के कन्धे से कन्धा मिला दुश्मनों के दान्त खट्टे करते हुए शहीद हो जाती थी। मराठा महिलाएँ भी अपने योधा पति की युधभूमि में पूरा साथ देती रही हैं।

परदा
परदा वह प्रथा है जिसमें कुछ समुदायों में महिलाओं को अपने तन को इस प्रकार से ढंकना जरूरी होता है कि उनकी त्वचा और रूप-रंग का किसी को अंदाजा ना लगे. यह महिलाओं के क्रियाकलापों को सीमित कर देता है; यह आजादी से मिलने-जुलने के उनके अधिकार को सीमित करता है और यह महिलाओं की अधीनता का एक प्रतीक है। आम धारणा के विपरीत यह ना तो हिंदुओं और ना ही मुसलमानों के धार्मिक उपदेशों को प्रतिबिंबित करता है, हालांकि दोनों संप्रदायों के धार्मिक नेताओं की लापरवाही और पूर्वाग्रहों के कारण गलतफ़हमी पैदा हुई है।

देवदासी
देवदासी दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में एक धार्मिक प्रथा है जिसमें देवता या मंदिर के साथ महिलाओं की “शादी” कर दी जाती है। यह परंपरा दसवीं सदी ए.डी. तक अच्छी तरह अपनी पैठ जमा जुकी थी।[20] बाद की अवधि में देवदासियों का अवैध यौन उत्पीडन भारत के कुछ हिस्सों में एक रिवाज बन गया।
अंग्रेजी शासन
यूरोपीय विद्वानों ने 19वीं सदी में यह महसूस किया था कि हिंदू महिलाएं “स्वाभाविक रूप से मासूम” और अन्य महिलाओं से “अधिक सच्चरित्र” होती हैं।[21] अंग्रेजी शासन के दौरान राम मोहन राय, ईश्वर चंद्र विद्यासागर, ज्योतिबा फ़ुले, आदि जैसे कई सुधारकों ने महिलाओं के उत्थान के लिये लड़ाइयाँ लड़ीं. हालांकि इस सूची से यह पता चलता है कि राज युग में अंग्रेजों का कोई भी सकारात्मक योगदान नहीं था, यह पूरी तरह से सही नहीं है क्योंकि मिशनरियों की पत्नियाँ जैसे कि मार्था मौल्ट नी मीड और उनकी बेटी एलिज़ा काल्डवेल नी मौल्ट को दक्षिण भारत में लडकियों की शिक्षा और प्रशिक्षण के लिये आज भी याद किया जाता है – यह एक ऐसा प्रयास था जिसकी शुरुआत में स्थानीय स्तर पर रुकावटों का सामना करना पड़ा क्योंकि इसे परंपरा के रूप में अपनाया गया था। 1829 में गवर्नर-जनरल विलियम केवेंडिश-बेंटिक के तहत राजा राम मोहन राय के प्रयास सती प्रथा के उन्मूलन का कारण बने. विधवाओं की स्थिति को सुधारने में ईश्वर चंद्र विद्यासागर के संघर्ष का परिणाम विधवा पुनर्विवाह अधिनियम 1956 के रूप में सामने आया। कई महिला सुधारकों जैसे कि पंडिता रमाबाई ने भी महिला सशक्तीकरण के उद्देश्य को हासिल करने में मदद की.

कर्नाटक में कित्तूर रियासत की रानी, कित्तूर चेन्नम्मा ने समाप्ति के सिद्धांत (डाक्ट्रिन ऑफ़ लैप्स) की प्रतिक्रिया में अंग्रेजों के खिलाफ़ सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व किया। तटीय कर्नाटक की महारानी अब्बक्का रानी ने 16वीं सदी में हमलावर यूरोपीय सेनाओं, उल्लेखनीय रूप से पुर्तगाली सेना के खिलाफ़ सुरक्षा का नेतृत्व किया। झाँसी की महारानी रानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजों के खिलाफ़ 1857 के भारतीय विद्रोह का झंडा बुलंद किया। आज उन्हें सर्वत्र एक राष्ट्रीय नायिका के रूप में माना जाता है। अवध की सह-शासिका बेगम हज़रत महल एक अन्य शासिका थी जिसने 1857 के विद्रोह का नेतृत्व किया था। उन्होंने अंग्रेजों के साथ सौदेबाजी से इनकार कर दिया और बाद में नेपाल चली गयीं. भोपाल की बेगमें भी इस अवधि की कुछ उल्लेखनीय महिला शासिकाओं में शामिल थीं। उन्होंने परदा प्रथा को नहीं अपनाया और मार्शल आर्ट का प्रशिक्षण भी लिया।

चंद्रमुखी बसु, कादंबिनी गांगुली और आनंदी गोपाल जोशी कुछ शुरुआती भारतीय महिलाओं में शामिल थीं जिन्होंने शैक्षणिक डिग्रियाँ हासिल कीं.

1917 में महिलाओं के पहले प्रतिनिधिमंडल ने महिलाओं के राजनीतिक अधिकारों की माँग के लिये विदेश सचिव से मुलाक़ात की जिसे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का समर्थन हासिल था। 1927 में अखिल भारतीय महिला शिक्षा सम्मेलन का आयोजन पुणे में किया गया था।[16] 1929 में मोहम्मद अली जिन्ना के प्रयासों से बाल विवाह निषेध अधिनियम को पारित किया गया जिसके अनुसार एक लड़की के लिये शादी की न्यूनतम उम्र चौदह वर्ष निर्धारित की गयी थी।[16][22] हालांकि महात्मा गाँधी ने स्वयं तेरह वर्ष की उम्र में शादी की, बाद में उन्होंने लोगों से बाल विवाहों का बहिष्कार करने का आह्वान किया और युवाओं से बाल विधवाओं के साथ शादी करने की अपील की.[23]

भारत की आजादी के संघर्ष में महिलाओं ने एक महत्वपूर्ण भूमिका निभायी. भिकाजी कामा, डॉ॰ एनी बेसेंट, प्रीतिलता वाडेकर, विजयलक्ष्मी पंडित, राजकुमारी अमृत कौर, अरुना आसफ़ अली, सुचेता कृपलानी और कस्तूरबा गाँधी कुछ प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानियों में शामिल हैं। अन्य उल्लेखनीय नाम हैं मुथुलक्ष्मी रेड्डी, दुर्गाबाई देशमुख आदि. सुभाष चंद्र बोस की इंडियन नेशनल आर्मी की झाँसी की रानी रेजीमेंट कैप्टेन लक्ष्मी सहगल सहित पूरी तरह से महिलाओं की सेना थी। एक कवियित्री और स्वतंत्रता सेनानी सरोजिनी नायडू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष बनने वाली पहली भारतीय महिला और भारत के किसी राज्य की पहली महिला राज्यपाल थीं।

स्वतंत्र भारत
भारत में महिलाएं अब सभी तरह की गतिविधियों जैसे कि शिक्षा, राजनीति, मीडिया, कला और संस्कृति, सेवा क्षेत्र, विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी आदि में हिस्सा ले रही हैं।[7] इंदिरा गांधी जिन्होंने कुल मिलाकर पंद्रह वर्षों तक भारत के प्रधानमंत्री के रूप में सेवा की, दुनिया की सबसे लंबे समय तक सेवारत महिला प्रधानमंत्री हैं।[24]

भारत का संविधान सभी भारतीय महिलाओं को सामान अधिकार (अनुच्छेद 14), राज्य द्वारा कोई भेदभाव नहीं करने (अनुच्छेद 15 (1)), अवसर की समानता (अनुच्छेद 16), समान कार्य के लिए समान वेतन (अनुच्छेद 39 (घ)) की गारंटी देता है। इसके अलावा यह महिलाओं और बच्चों के पक्ष में राज्य द्वारा विशेष प्रावधान बनाए जाने की अनुमति देता है (अनुच्छेद 15(3)), महिलाओं की गरिमा के लिए अपमानजनक प्रथाओं का परित्याग करने (अनुच्छेद 51(ए)(ई)) और साथ ही काम की उचित एवं मानवीय परिस्थितियाँ सुरक्षित करने और प्रसूति सहायता के लिए राज्य द्वारा प्रावधानों को तैयार करने की अनुमति देता है। (अनुच्छेद 42)].[25]

भारत में नारीवादी सक्रियता ने 1970 के दशक के उत्तरार्द्ध के दौरान रफ़्तार पकड़ी. महिलाओं के संगठनों को एक साथ लाने वाले पहले राष्ट्रीय स्तर के मुद्दों में से एक मथुरा बलात्कार का मामला था। एक थाने (पुलिस स्टेशन) में मथुरा नामक युवती के साथ बलात्कार के आरोपी पुलिसकर्मियों के बरी होने की घटना 1979-1980 में एक बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शनों का कारण बनी. विरोध प्रदर्शनों को राष्ट्रीय मीडिया में व्यापक रूप से कवर किया गया और सरकार को साक्ष्य अधिनियम, दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता को संशोधित करने और हिरासत में बलात्कार की श्रेणी को शामिल करने के लिए मजबूर किया गया।[25] महिला कार्यकर्ताएं कन्या भ्रूण हत्या, लिंग भेद, महिला स्वास्थ्य और महिला साक्षरता जैसे मुद्दों पर एकजुट हुईं.

चूंकि शराब की लत को भारत में अक्सर महिलाओं के खिलाफ हिंसा से जोड़ा जाता है,[26] महिलाओं के कई संगठनों ने आंध्र प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, उड़ीसा, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों में शराब-विरोधी अभियानों की शुरुआत की.[25] कई भारतीय मुस्लिम महिलाओं ने शरीयत कानून के तहत महिला अधिकारों के बारे में रूढ़िवादी नेताओं की व्याख्या पर सवाल खड़े किये और तीन तलाक की व्यवस्था की आलोचना की.[16]

1990 के दशक में विदेशी दाता एजेंसियों से प्राप्त अनुदानों ने नई महिला-उन्मुख गैरसरकारी संगठनों (एनजीओ) के गठन को संभव बनाया. स्वयं-सहायता समूहों एवं सेल्फ इम्प्लॉयड वुमेन्स एसोसिएशन (सेवा) जैसे एनजीओ ने भारत में महिलाओं के अधिकारों के लिए एक प्रमुख भूमिका निभाई है। कई महिलाएं स्थानीय आंदोलनों की नेताओं के रूप में उभरी हैं। उदाहरण के लिए, नर्मदा बचाओ आंदोलन की मेधा पाटकर.

भारत सरकार ने 2001 को महिलाओं के सशक्तीकरण (स्वशक्ति) वर्ष के रूप में घोषित किया था।[16] महिलाओं के सशक्तीकरण की राष्ट्रीय नीति 2001 में पारित की गयी थी।[27]

2006 में बलात्कार की शिकार एक मुस्लिम महिला इमराना की कहानी मीडिया में प्रचारित की गयी थी। इमराना का बलात्कार उसके ससुर ने किया था। कुछ मुस्लिम मौलवियों की उन घोषणाओं का जिसमें इमराना को अपने ससुर से शादी कर लेने की बात कही गयी थी, व्यापक रूप से विरोध किया गया और अंततः इमराना के ससुर को 10 साल की कैद की सजा दी गयी। कई महिला संगठनों और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड द्वारा इस फैसले का स्वागत किया गया।[28]

अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के एक दिन बाद, 9 मार्च 2010 को राज्यसभा ने महिला आरक्षण बिल को पारित कर दिया जिसमें संसद और राज्य की विधान सभाओं में महिलाओं के लिए 33% आरक्षण की व्यवस्था है

JNU bharat ka ???? KHAI ya SECULAR ???? ka proxy chehraa

जेएनयू के भारत विरोधी सिरफिरे वामपंथियों का इलाज जरूरी – संजय द्विवेदी

Posted: 15 Feb 2016 04:57 AM PST

एक यक्ष प्रश्न –

इतने बड़े विचारकों, विश्व राजनीति-अर्थनीति की गहरी समझ, तमाम नेताओं की अप्रतिम ईमानदारी और विचारधारा के प्रति समर्पण के किस्सों के बावजूद भारत का वामपंथी आंदोलन क्यों जनता के बीच स्वीकृति नहीं पा सका? अब लगता है, भारत की महान जनता इन राष्ट्रद्रोहियों को पहले से ही पहचानती थी, इसलिए इन्हें इनकी मौत मरने दिया। जो हर बार गलती करें और उसे ऐतिहासिक भूल बताएं, वही वामपंथी हैं।

वामपंथी वे हैं जो नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे राष्ट्रनायक को’तोजो का कुत्ता’ बताएं, वे वही हैं जो चीन के साथ हुए युद्ध में भारत विरोध में खड़े रहे। क्योंकि चीन के चेयरमैन माओ उनके भी चेयरमेन थे। वे ही हैं जो आपातकाल के पक्ष में खड़े रहे। वे ही हैं जो अंग्रेजों के मुखबिर बने और आज भी उनके बिगड़े शहजादे (माओवादी) जंगलों में आदिवासियों का जीवन नरक बना रहे हैं।

देश तोड़ने की दुआएं कौन कर रहे हैः

अगर जेएनयू परिसर में वे ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ करते नजर आ रहे हैं, तो इसमें नया क्या है? उनकी बदहवासी समझी जा सकती है। सब कुछ हाथ से निकलता देख, अब सरकारी पैसे पर पल रहे जेएनयू के कुछ बुद्धिधारी इस इंतजाम में लगे हैं कि आईएसआई (पाकिस्तान) उनके खर्चे उठा ले। जब तक जेएनयू में भारत विरोधी नारे लगाने वाली ताकतें हैं ,देश के दुश्मनों को हमारे मासूम लोगों को कत्ल करने में दिक्कत क्या है? हमारा खून बहे, हमारा देश टूटे यही भारतीय वामपंथ का छुपा हुआ एजेंडा है। हमारी सुरक्षा एजेंसियां देश में आतंकियों के मददगार स्लीपर सेल की तलाश कर रही हैं, इसकी ज्यादा बड़ी जगह जेएनयू है। वहां भी नजर डालिए।

सरकारी पैसे पर राष्ट्रद्रोह की विषवेलः

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय एक ऐसी जगह है, जहां सरकारी पैसे से राष्ट्रद्गोह के बीज बोए जाते हैं। यहां ये घटनाएं पहली बार नहीं हुयी हैं। ये वे लोग हैं नक्सलियों द्वारा हमारे वीर सिपाहियों की हत्या पर खुशियां मनाते हैं। अपनी नाक के नीचे भारतीय राज्य अरसे से यह सब कुछ होने दे रहा है,यह आश्चर्य की बात है। इस बार भी घटना के बाद माफी मांग कर अलग हो जाने के बजाए, जिस बेशर्मी से वामपंथी दलों के नेता मैदान में उतरकर एक राष्ट्रद्रोही गतिविधि का समर्थन कर रहे हैं, वह बात बताती है, उन्हें अपने किए पर कोई पछतावा नहीं है। यह कहना कि जेएनयू को बदनाम किया जा रहा है,ठीक नहीं है। गांधी हत्या की एक घटना के लिए आजतक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लांछित करने वाली शक्तियां क्यों अपने लिए छूट चाहती हैं? जबकि अदालतों ने भी गांधी हत्या के आरोप से संघ को मुक्त कर दिया है। टीवी बहसों को देखें तो अपने गलत काम पर पछतावे के बजाए वामपंथी मित्र भाजपा और संघ के बारे में बोलने लगते हैं। भारत को तोड़ने और खंडित करने के नारे लगाने वाले और ‘इंडिया गो बैक’ जैसी आवाजें लगाने वाले किस तरह की मानसिकता में रचे बसे हैं, इसे समझा जा सकता है। देश तोड़ने की दुआ करने वालों को पहचानना जरूरी है।

राहुल जी, आप वहां क्या कर रहे हैः

वामपंथी मित्रों की बेबसी, मजबूरी और बदहवासी समझी जा सकती है, किंतु भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जैसी जिम्मेदार पार्टी के नेता राहुल गांधी का रवैया समझ से परे है। कांग्रेस पार्टी का राष्ट्रीय आंदोलन का अतीत और उसके नेताओं का राष्ट्र की रक्षा के लिए बलिदान लगता है राहुल जी भूल गए हैं। आखिर ऐसी क्या मजबूरी है कि वे जाकर देशद्रोहियों के पाले में खड़े हो जाएं?उनकी पं. नेहरू, श्रीमती इंदिरा गांधी और श्री राजीव गांधी की विरासत का यह अपमान है। इनमें से दो ने तो अपने प्राण भी इस राष्ट्र की रक्षा के लिए निछावर कर दिए। ऐसे परिवार का अंध मोदी विरोध या भाजपा विरोध में इस स्तर पर उतर जाना चिंता में डालता है। पहले दो दिन कांग्रेस ने जिस तरह की राष्ट्रवादी लाइन ली, उस पर तीसरे दिन जेएनयू जाकर राहुल जी ने पानी फेर दिया। जेएनयू जिस तरह के नारे लगे उसके पक्ष में राहुल जी का खड़ा होना बहुत दुख की बात है। वे कांग्रेस जैसी गंभीर और जिम्मेदार पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। उन्हें यह सोचना होगा कि भाजपा और नरेंद्र मोदी का विरोध करते-करते कहीं वे देशद्रोहियों के एजेंडे पर तो नहीं जा रहे हैं। उन्हें और कांग्रेस पार्टी को यह भी ख्याल रखना होगा कि किसी दल और नेता से बड़ा है देश और उसकी अस्मिता। देश की संप्रभुता को चुनौती दे रही ताकतों से किसी भी तरह की सहानुभूति रखना राहुल जी और उनकी पार्टी के लिए ठीक नहीं है। जेएनयू की घटना को लेकर पूरे देश में गुस्सा है, ऐसे समूहों के साथ अपने आप को चिन्हित कराना, कांग्रेस की परंपरा और उसके सिद्धांतों के खिलाफ है।

अभिव्यक्ति की आजादी के नाम परः

कौन सा देश होगा जो अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर खुद को तोड़ने की नारेबाजी को प्रोत्साहन देगा। राष्ट्र के खिलाफ षडयंत्र और देशद्रोहियों की याद में कार्यक्रम करने वालों के साथ जो आज खड़े हैं, वे साधारण लोग नहीं हैं। जिस देश ने आपको सांसद, विधायक, मंत्री और प्रोफेसर बनाया। लाखों की तनख्वाहें देकर आपके सपनों में रंग भरे, आपने उस देश के लिए क्या किया?आजादी आप किससे चाहते हैं? इस मुल्क से आजादी, जिसने आपको एक बेहतर जिंदगी दी। अन्याय और अत्याचार से मुक्ति दिलाने की आपकी यात्रा क्यों गांव-गरीब और मैदानों तक नहीं पहुंचती? अपने ही रचे जेएनयू जैसे स्वर्ग में शराब की बोतलों और सिगरेट की घुंओं में ‘क्रांति’ करना बहुत आसान है किंतु जमीन पर उतर कर आम लोगों के लिए संघर्ष करना बहुत कठिन है। हिंदुस्तान के आम लोग पढ़े-लिखे लोगों को बहुत उम्मीदों से देखते हैं कि उनकी शिक्षा कभी उनकी जिंदगी में बदलाव लाने का कारण बनेगी। किंतु आपके सपने तो इस देश को तोड़ने के हैं। समाज को तोड़ने के हैं। समाज में तनाव और वर्ग संघर्ष की स्थितियां पैदा कर एक ऐसा वातावरण बनाने पर आपका जोर है ताकि लोगों की आस्था लोकतंत्र से, सरकार से और प्रशासनिक तंत्र से उठ जाए। विदेशी विचारों से संचालित और विदेशी पैसों पर पलने वालों की मजबूरी तो समझी जा सकती है। किंतु भारत के आम लोगों के टैक्स के पैसों से एक महान संस्था में पढ़कर इस देश के सवालों से टकराने के बजाए, आप देश से टकराएंगें तो आपका सिर ही फूटेगा।

जेएनयू जैसी बड़ी और महान संस्था का नाम किसी शोधकार्य और अकादमिक उपलब्धि के लिए चर्चा में आए तो बेहतर होगा, अच्छा होगा कि ऐसे प्रदर्शनों-कार्यक्रमों के लिए राजनीतिक दल या समूह जंतर-मंतर, इंडिया गेट, राजधाट और रामलीला मैदान जैसी जगहें चुनें। शिक्षा परिसरों में ऐसी घटनाओं से पठन-पाठन का वातावरण तो बिगड़ता ही है, तनाव पसरता है, जो ठीक नहीं है। इससे विश्वविद्यालय को नाहक की बदनामी तो मिलती ही है, और वह एक खास नजर से देखा जाने लगता है। अपने विश्वविद्यालय के बचाने की सबसे ज्यादा जिम्मेदारी शायद वहां के अध्यापकों और छात्रों की ही है। ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना ही, इस बार मिली बदनामी का सबसे बड़ा इलाज है।

एक लोकतंत्र में होते हुए आपकी सांसें घुट रही हैं, तो क्या माओ के राज में, तालिबानों और आईएस के राज में आपको चैन मिलेगा? सच तो यह है कि आप बेचैन आत्माएं हैं, जिनका विचार ही है भारत विरोध, भारत द्वेष, लोकतंत्र का विरोध। आपका सपना है एक कमजोर और बेचारा भारत। एक टूटा हुआ, खंड-खंड भारत। ये सपने आप दिन में भी देखते हैं, ये ही आपके नारे बनकर फूटते हैं। पर भूल जाइए, ये सपना कभी साकार नहीं होगा, क्योंकि देश और उसके लोग आपके बहकावे में आने को तैयार नहीं है। देश तोड़क गतिविधियों और राष्ट्र विरोधी आचरण की आजादी यह देश किसी को नहीं दे सकता। आप चाहे जो भी हों। जेएनयू या दिल्ली भारत नहीं है। भारत के गांवों में जाइए और पूछिए कि आपने जो किया उसे कितने लोगों की स्वीकृति है, आपको सच पता चल जाएगा। राष्ट्र की अस्मिता और चेतना को चुनौती मत दीजिए। क्योंकि कोई भी व्यक्ति, विचारधारा और दल इस राष्ट्र से बड़ा नहीं हो सकता। चेत जाइए।

(लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं)
-संजय द्विवेदी, अध्यक्षः जनसंचार विभाग,माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, प्रेस काम्पलेक्स, एमपी नगर, भोपाल-462011 (मप्र)मोबाइलः 09893598888